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श्लोक 14.48.4  |
प्राणायामैरथ प्राणान् संयम्य स पुन: पुन:।
दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात् परं तत:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य दस या बारह प्राणायामों के द्वारा बार-बार अपने प्राणों को वश में करता है, वह भी चौबीस तत्त्वों से परे पच्चीसवें तत्त्व भगवान् को प्राप्त हो जाता है॥4॥ |
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| A person who controls his life again and again through ten or twelve pranayams also attains God, the twenty-fifth element beyond the twenty-four elements. 4॥ |
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