श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 48: आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.48.4 
प्राणायामैरथ प्राणान् संयम्य स पुन: पुन:।
दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात् परं तत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य दस या बारह प्राणायामों के द्वारा बार-बार अपने प्राणों को वश में करता है, वह भी चौबीस तत्त्वों से परे पच्चीसवें तत्त्व भगवान् को प्राप्त हो जाता है॥4॥
 
A person who controls his life again and again through ten or twelve pranayams also attains God, the twenty-fifth element beyond the twenty-four elements. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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