vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन
»
श्लोक 7
श्लोक
14.47.7
यो विद्वान् सहवासं च विवासं चैव पश्यति।
तथैवैकत्वनानात्वे स दु:खात् प्रतिमुच्यते॥ ७॥
अनुवाद
जो विद्वान संयोग को वियोग के रूप में देखता है और इसी प्रकार अनेकता में एकता को देखता है, वह दुःख से पूर्णतया मुक्त हो जाता है ॥7॥
The scholar who sees coincidence as separation and similarly sees unity in diversity, becomes completely free from sorrow. 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×