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mahabharat 14.47.11: इसमें कोई संदेह नहीं कि संन्यासी शुभ-अशुभ तथा सत्य-असत्य इन तीनों कर्मों का त्याग करके मुक्त हो जाता है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  14.47.11 
हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म जन्तु: शुभाशुभम्।
उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशय:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि संन्यासी शुभ-अशुभ तथा सत्य-असत्य इन तीनों कर्मों का त्याग करके मुक्त हो जाता है ॥11॥
 
There is no doubt that a Sanyasi becomes free by renouncing all the threefold action of good and inauspicious and also of truth and untruth. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)