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mahabharat 14.47.10: जो द्वैत से रहित, नमस्कार की इच्छा न रखने वाला और स्वधाकार (पितृ कर्म) न करने वाला संन्यासी है, वह परम शांति के द्वारा ही निर्गुण, द्वैत से परे, शाश्वत तत्त्व को प्राप्त होता है ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.47.10 
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो नि:स्वधाकार एव च।
निर्गुणं नित्यमद्वन्द्वं प्रशमेनैव गच्छति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो द्वैत से रहित, नमस्कार की इच्छा न रखने वाला और स्वधाकार (पितृ कर्म) न करने वाला संन्यासी है, वह परम शांति के द्वारा ही निर्गुण, द्वैत से परे, शाश्वत तत्त्व को प्राप्त होता है ॥10॥
 
One who is a sannyasi who is free from dualities, has no desire for salutations and does not do svadhakar (ancestral work), he attains the nirguna, beyond duality, eternal essence only through extreme peace. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)