श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  14.43.40 
न सत्यं विन्दते कश्चित् क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति।
गुणानां गुणभूतानां यत् परं परमं महत्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जो गुणों और गुणों के कर्मों से परे है, जो सत्य को जानने वाला है, उस परमात्मा को कोई नहीं जानता; परन्तु वह सबको जानता है ॥40॥
 
No one knows that Supreme Being, who is beyond the qualities and the actions of the qualities, who is the knower of truth; but He knows everyone. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)