श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  14.43.36 
अलिङ्गग्रहणो नित्य: क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मक:।
तस्मादलिङ्ग: क्षेत्रज्ञ: केवलं ज्ञानलक्षण:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
नित्यज्ञानी आत्मा में किसी भी लक्षण का कोई लक्षण नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाशित एवं) निर्गुण है। अतः ज्ञानी आत्मा लक्षणरहित है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना जाता है। ॥36॥
 
The eternally aware soul has no sign of any sign; because it is (self-illuminating and) attributeless. Hence, the aware soul is without any sign; hence only knowledge is considered its sign (form). ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)