श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  14.43.35 
बुद्धिरध्यवसायेन ज्ञानेन च महांस्तथा।
निश्चित्य ग्रहणाद् व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशय:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
निश्चय से बुद्धि और ज्ञान से महातत्त्व का ग्रहण होता है। कर्मों से इनका अस्तित्व ज्ञात होता है, इसलिए इन्हें व्यक्त माना जाता है, परंतु वास्तव में इन्द्रियों से परे होने के कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त हैं, इसमें संशय नहीं है ॥35॥
 
Through determination, the intellect is grasped and through knowledge, the Mahatattva is grasped. Their existence is ascertained through their actions and hence they are considered manifest, but in reality, being beyond the senses, these intellect etc. are unmanifest, there is no doubt in this. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)