श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  14.43.29 
पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घ्राणेन हि स गृह्यते।
घ्राणस्थश्च तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते॥ २९॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी का गंध नामक गुण नाक के द्वारा अनुभव किया जाता है, और नाक में स्थित वायु उस गंध को अनुभव करने में सहायता करती है ॥29॥
 
The quality of the earth called smell is perceived through the nose, and the air in the nose helps in experiencing that smell. ॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)