vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता
»
श्लोक 29
श्लोक
14.43.29
पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घ्राणेन हि स गृह्यते।
घ्राणस्थश्च तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते॥ २९॥
अनुवाद
पृथ्वी का गंध नामक गुण नाक के द्वारा अनुभव किया जाता है, और नाक में स्थित वायु उस गंध को अनुभव करने में सहायता करती है ॥29॥
The quality of the earth called smell is perceived through the nose, and the air in the nose helps in experiencing that smell. ॥ 29॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×