Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.42.7-8h: लोभ, लोभ से किए गए कर्म और उन कर्मों का फल वास्तव में कुछ भी नहीं है। शरीर के बाह्य अंग जैसे मांस-रक्त आदि एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसीलिए इन्हें दरिद्र और कंजूस माना गया है।   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  14.42.7-8h 
लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिंचना:।
मांसशोणितसंघाता अन्योन्यस्योपजीविन:॥ ७॥
बहिरात्मान इत्येते दीना: कृपणजीविन:।
 
 
अनुवाद
लोभ, लोभ से किए गए कर्म और उन कर्मों का फल वास्तव में कुछ भी नहीं है। शरीर के बाह्य अंग जैसे मांस-रक्त आदि एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसीलिए इन्हें दरिद्र और कंजूस माना गया है।
 
Greed, the deeds done with greed and the fruits of those deeds are nothing in reality. The external parts of the body like flesh and blood etc. are dependent on each other. That is why they are considered to be poor and miserly. 7 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)