श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  14.42.63 
तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च
यक्षा: पिशाचा: पितरो वयांसि।
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे
महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण समुदाय, देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और समस्त महर्षि भी सदैव उस परमात्मा की स्तुति करते हैं॥63॥
 
The Brahmin community, gods, demons, yakshas, ​​vampires, ancestors, birds, demons, ghosts and all the great sages also always praise that Supreme Soul. 63॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)