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mahabharat 14.42.55: यह कालचक्र 'मोह' नामक अत्यन्त गहन एवं विशाल सागर है। यह देवताओं सहित सम्पूर्ण जगत् का सारांश और विस्तार करता है तथा सबको जागृत करता है ॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  14.42.55 
एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंज्ञितम्।
विक्षिपेत् संक्षिपेच्चैव बोधयेत् सामरं जगत‍्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
यह कालचक्र 'मोह' नामक अत्यन्त गहन एवं विशाल सागर है। यह देवताओं सहित सम्पूर्ण जगत् का सारांश और विस्तार करता है तथा सबको जागृत करता है ॥ 55॥
 
This time cycle is a very deep and huge ocean called 'Moha'. It summarizes and expands the whole world including the gods and awakens everyone. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)