श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  14.42.50 
यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽऽत्मनो हृदि।
स्वयंज्योतिस्तदा सूक्ष्मात् सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जब प्रसन्नचित्त योगी समस्त प्राणियों को अपने अन्तरात्मा में स्थित देखने लगता है, तब वह स्वयं प्रकाशस्वरूप होकर सूक्ष्मतम परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ॥50॥
 
When a yogi, with a happy mind, begins to see all living beings situated in his inner being, then he himself becomes a form of light and attains the most subtle, supreme God. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)