श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  14.42.48 
इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम्।
मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्माग्नि: समिध्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
विषयों की इच्छा करने वाली समस्त इन्द्रियों को रोककर तथा लोकों का त्याग करके मुनिका के अध्यात्मज्ञान की प्रभा अधिक प्रकाशित हो जाती है ॥48॥
 
By stopping all the senses desirous of objects and leaving the place of the masses, the radiance of Munika's spiritual knowledge becomes more illuminated. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)