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mahabharat 14.42.4: जिस तत्त्व से वह उत्पन्न होता है, उसी में विलीन हो जाता है। ये तत्त्व एक के बाद एक प्रत्यक्ष क्रम से प्रकट होते हैं और अपने-अपने कारणों में विपरीत क्रम से विलीन हो जाते हैं।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.42.4 
यद् यस्माज्जायते भूतं तत्र तत् प्रविलीयते।
लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जिस तत्त्व से वह उत्पन्न होता है, उसी में विलीन हो जाता है। ये तत्त्व एक के बाद एक प्रत्यक्ष क्रम से प्रकट होते हैं और अपने-अपने कारणों में विपरीत क्रम से विलीन हो जाते हैं।॥4॥
 
The element from which it is born, dissolves in the same. These elements appear one after the other in direct order and dissolve in their respective causes in reverse order.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)