श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 4: मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन  »  श्लोक 25-27
 
 
श्लोक  14.4.25-27 
मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे॥ २५॥
काञ्चन: सुमहान् पादस्तत्र कर्म चकार स:।
तत: कुण्डानि पात्रीश्च पिठराण्यासनानि च॥ २६॥
चक्रु: सुवर्णकर्तारो येषां संख्या न विद्यते।
तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हिमालय के उत्तरी भाग में मेरु पर्वत के निकट एक विशाल स्वर्ण पर्वत है। उसके निकट उन्होंने एक यज्ञशाला बनवाई और वहाँ यज्ञ प्रारंभ किया। उनकी आज्ञा से अनेक सुनार आए और उन्होंने एक स्वर्ण कुंड, स्वर्ण पात्र, थालियाँ और आसन (कुर्सी आदि) तैयार किए। उन सब वस्तुओं की गणना करना असंभव है। 25-27
 
There is a great golden mountain near Mount Meru in the northern part of the Himalayas. Near it, he built a Yagyashaala and started the Yagya there. On his orders, many goldsmiths came and prepared a golden kund (pitcher), golden utensils, plates and seats (stools etc.). It is impossible to count all those things. 25-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)