श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 4: मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.4.1 
युधिष्ठिर उवाच
शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षे: परिकीर्तनम्।
द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - धर्म के ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्त की कथा और उनके गुणों का गुणगान सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझे बताएँ॥1॥
 
Yudhishthir asked – Knower of religion, sinless Maharishi Dwaipayan! I want to hear the story of Rajarshi Marutta and the praises of his virtues. please tell me 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)