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mahabharat 14.39.5: फिर भी, इन उन्नति और अवनति वाले तथा एक-दूसरे के पीछे चलने वाले गुणों में से कुछ की न्यूनता और कुछ की अधिकता पाई जाती है। ऐसा कैसे होता है? इसका स्पष्टीकरण किया गया है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 14.39: सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 39: सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.39.5 
उद्रेकव्यतिरिक्तानां तेषामन्योन्यवर्तिनाम्।
वक्ष्यते तद् यथा न्यूनं व्यतिरिक्तं च सर्वश:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
फिर भी, इन उन्नति और अवनति वाले तथा एक-दूसरे के पीछे चलने वाले गुणों में से कुछ की न्यूनता और कुछ की अधिकता पाई जाती है। ऐसा कैसे होता है? इसका स्पष्टीकरण किया गया है ॥5॥
 
Even so, out of these qualities which are of the nature of progress and decline and follow each other, some are found to be lacking and some are found to be in excess. How is it so? This is explained. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)