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श्लोक 14.37.18  |
रजोगुणा वो बहुधानुकीर्तिता
यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च।
नरोऽपि यो वेद गुणानिमान् सदा
स राजसै: सर्वगुणैर्विमुच्यते॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| मुनिवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें नाना प्रकार के राजस गुणों और उनके अनुरूप आचरणों का यथार्थ वर्णन किया है। जो मनुष्य इन गुणों को जानता है, वह इन समस्त राजस गुणों के बंधनों से सदैव दूर रहता है। 18॥ |
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| Munivaro! In this way, I have accurately described to you the various types of Rajas qualities and their corresponding behaviours. The person who knows these qualities always remains away from the bondages of all these rajasic qualities. 18॥ |
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्याय:॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७॥
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