श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 37: रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  14.37.17 
अस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जायमाना: पुन: पुन:।
प्रेत्य भाविकमीहन्ते ऐहलौकिकमेव च।
ददति प्रतिगृह्णन्ति तर्पयन्त्यथ जुह्वति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ऐसे लोग इस संसार में बार-बार जन्म लेकर विषय-भोगों में लीन रहते हैं और इस लोक तथा परलोक में सुख पाने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए वे स्वार्थवश दान देते हैं, दान लेते हैं, तर्पण और यज्ञ करते हैं॥ 17॥
 
Such people, taking birth again and again in this world, remain engrossed in sensual pleasures and try to attain happiness in this world and the next. Therefore, they give donations, accept gifts and perform tarpana and yajnas with selfish motives.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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