श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 9-11
 
 
श्लोक  14.35.9-11 
के पन्थान: शिवाश्च स्यु: किं सुखं किं च दुष्कृतम्।
एतान् मे भगवन् प्रश्नान् याथातथ्येन सुव्रत॥ ९॥
वक्तुमर्हसि विप्रर्षे यथावदिह तत्त्वत:।
त्वदन्य: कश्चन प्रश्नानेतान् वक्तुमिहार्हति॥ १०॥
ब्रूहि धर्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं मम।
मोक्षधर्मार्थकुशलो भवाँल्लोकेषु गीयते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
कौन-से मार्ग कल्याणकारी हैं ? उत्तम सुख क्या है ? और पाप किसे कहते हैं ? उत्तम व्रत का पालन करने वाले गुरुदेव ! आप मेरे इन प्रश्नों का यथार्थ उत्तर देने में समर्थ हैं । धर्मज्ञों में श्रेष्ठ तत्त्वदर्शी ! यह सब जानने के लिए मेरे मन में बड़ी उत्सुकता है । इस विषय में इन प्रश्नों का यथार्थ उत्तर देने में आपके अतिरिक्त अन्य कोई समर्थ नहीं है । अतः आप मुझे बताएँ; क्योंकि संसार में मोक्षतत्त्व के ज्ञान में आप ही निपुण कहे गए हैं ॥9-11॥
 
Which paths are beneficial? What is the best happiness? And what is called sin? Gurudev who observes the best fast! You are able to answer these questions of mine realistically. The best philosopher among religious scholars! There is great eagerness in my mind to know all this. There is no one other than you who is capable of giving true answers to these questions on this subject. So you tell me; Because in the world you are said to be proficient in the knowledge of the principles of salvation. 9-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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