श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.35.5 
तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह।
सर्वं तु ते प्रवक्ष्यामि यत्र वै संशयो द्विज॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! गुरु ने ऐसा कहने वाले शिष्य से कहा - 'विप्र! मैं तुम्हें वह सब बताऊँगा जिसके विषय में तुम्हें संदेह है।' ॥5॥
 
Parth! The Guru said to the disciple who had said this - 'Vipra! I will tell you everything about which you have doubts.' ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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