श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  14.35.31 
इत्युक्त: स मुनिश्रेष्ठैर्यदाह प्रपितामह:।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु शिष्य यथागमम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
शिष्य! महर्षियों के ऐसा कहने पर मैं तुम्हें शास्त्रानुसार पितामह ब्रह्माजी ने जो कहा है, उसे विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ। उसे सुनो॥31॥
 
Disciple! After being told this by the great sages, I will tell you in full detail what the great grandfather Brahma said as per the scriptures. Listen to it. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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