श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  14.35.30 
कौ चोभौ कर्मणां मार्गौ प्राप्नुयुर्दक्षिणोत्तरौ।
प्रलयं चापवर्गं च भूतानां प्रभवाप्ययौ॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
और वे दो कर्ममार्ग कौन-से हैं जिनके द्वारा मनुष्य दक्षिण और उत्तर दिशा को प्राप्त करते हैं ? प्रलय और मोक्ष क्या हैं ? और प्राणियों का जन्म और मृत्यु क्या है ? ॥30॥
 
‘And what are those two paths of deeds by which men attain the southern and northern directions? What are pralaya and moksha? And what are the births and deaths of creatures?’॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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