|
| |
| |
श्लोक 14.35.29  |
कथं कर्म क्रियात् साधु कथं मुच्येत किल्बिषात्।
के नो मार्गा: शिवाश्च स्यु: किं सत्यं किं च दुष्कृतम्॥ २९॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| उत्तम कर्म किस प्रकार करने चाहिए ? मनुष्य पापों से कैसे मुक्त हो सकता है ? कौन-से मार्ग हमारे लिए कल्याणकारी हैं ? सत्य क्या है ? और पाप क्या है ?॥29॥ |
| |
| ‘How should one perform the best deeds? How can a man be freed from sins? Which paths are beneficial for us? What is truth? And what is sin?॥ 29॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|