श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  14.35.18 
यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते।
इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता और किसी वस्तु का अभिमान नहीं करता, वह इस लोक में ही रहता हुआ ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है ॥18॥
 
He who does not desire anything and is not proud of anything, attains the state of Brahma while living in this world itself. ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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