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श्लोक 14.35.18  |
यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते।
इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| जो किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता और किसी वस्तु का अभिमान नहीं करता, वह इस लोक में ही रहता हुआ ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है ॥18॥ |
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| He who does not desire anything and is not proud of anything, attains the state of Brahma while living in this world itself. ॥18॥ |
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