श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.35.1 
अर्जुन उवाच
ब्रह्म यत्परमं ज्ञेयं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।
भवतो हि प्रसादेन सूक्ष्मे मे रमते मति:॥ १॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन बोले - हे प्रभु! आपकी कृपा से मेरी बुद्धि सूक्ष्म विषयों के श्रवण में लगी हुई है, अतः आप कृपा करके उस परब्रह्म के जानने योग्य स्वरूप का वर्णन करें।॥1॥
 
Arjun said - O Lord! By your grace my intellect is engaged in listening to subtle subjects, so please explain the nature of the Supreme Brahman which is worth knowing. ॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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