श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 34: भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  14.34.6 
सम्यगुपायो दृष्टश्च भ्रमरैरिव लक्ष्यते।
कर्मबुद्धिरबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गैरिवाश्रितम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस क्षेत्र को जानने की पूर्ण विधि खोज ली गई है। वह यह है कि उसे देखने की क्रिया का त्याग करने से वह मधुमक्खियों द्वारा गंध की भाँति स्वतः ही जान लिया जाता है। परंतु कर्म से संबंधित बुद्धि ज्ञान के समान प्रतीत होती है, क्योंकि वह वास्तव में बुद्धि नहीं है, तथापि वह ज्ञान भी नहीं है। (इसलिए कर्म के द्वारा उसका साक्षात्कार नहीं हो सकता)॥6॥
 
The complete method to realize that region has been discovered. It is that by abandoning the act of seeing it, it is known automatically like the smell by the bees. But the intellect related to action appears like knowledge because it is not actually intelligence, yet it is not knowledge. (Therefore it cannot be realized through action)॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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