श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 34: भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.34.4 
ब्राह्मण्युवाच
यदिदं ब्राह्मणो लिङ्गं क्षेत्रज्ञ इति संज्ञितम्।
ग्रहीतुं येन यच्छक्यं लक्षणं तस्य तत् क्व नु॥ ४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने पूछा - नाथ! यह कैसे सम्भव है कि क्षेत्रज्ञ नाम से विख्यात अवतारी आत्मा को ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है? क्योंकि आत्मा तो ब्रह्म के वश में ही रहती है और यह कभी नहीं देखा गया कि जिसके वश में है, वह उसका स्वरूप है। 4॥
 
The Brahmin asked – Nath! How is this possible that the incarnate soul, known as Kshetragya, is said to be the form of Brahma? Because the soul remains under the control of Brahma and it has never been seen that the one under whose control is his form. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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