श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 34: भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  14.34.3 
ब्राह्मण उवाच
अरणीं ब्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणि:।
तप:श्रुतेऽभिमथ्नीतो ज्ञानाग्निर्जायते तत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने कहा - देवि! तुम बुद्धि को निम्न स्तर और गुरु को उच्च स्तर समझो। तप द्वारा ध्यान करने तथा वेद-वेदान्तों का श्रवण और मनन करने से उन वनों से ज्ञानरूपी अग्नि प्रकट होती है।॥3॥
 
The Brahmin said – Goddess! You consider the intellect as the lower level and the Guru as the upper level. By meditating through penance and hearing and meditating on the Vedas and Vedas, the fire of knowledge appears from those forests. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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