श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 34: भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.34.2 
उपायं तं मम ब्रूहि येनैषा लभ्यते मति:।
तन्मन्ये कारणं त्वत्तो यत एषा प्रवर्तते॥ २॥
 
 
अनुवाद
अतः आप कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं भी इस ज्ञान को प्राप्त कर सकूँ। मेरा विश्वास है कि वह उपाय केवल आपसे ही जाना जा सकता है॥ 2॥
 
Therefore, please tell me a way by which I too can acquire this wisdom. I believe that that way can be known only from you.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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