श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 31: राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  14.31.11 
स तैर्गुणै: संहतदेहबन्धन:
पुन: पुनर्जायति कर्म चेहते।
जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो
मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उन गुणों द्वारा शरीर के बंधन में बँधकर वह बार-बार जन्म लेता है और नाना प्रकार के कर्म करता रहता है। फिर जब जीवन का अंत आता है, तो उसके शरीर के तत्त्व अलग होकर बिखर जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है। इसके बाद वह पुनः जन्म-मरण के बंधन में पड़ जाता है।॥11॥
 
‘By being bound in the bondage of the body by those qualities, he takes birth again and again and keeps performing various types of deeds. Then when the end of life comes, the elements of his body separate and scatter and he dies. After this, he again falls into the bondage of birth and death.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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