श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 31: राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  14.31.1-2 
ब्राह्मण उवाच
त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणत: स्मृता:।
प्रहर्ष: प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणा:॥ १॥
तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणा: स्मृता:।
श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने कहा - देवि! इस संसार में सत्व, रज और तम - ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार नौ प्रकार के माने गए हैं। हर्ष, प्रेम और आनंद - ये तीन सात्त्विक गुण हैं; राग, क्रोध और द्वेष - ये तीन राजस गुण हैं तथा थकान, तंद्रा और मोह - ये तीन तामस गुण हैं। 1-2॥
 
The Brahmin said – Goddess! In this world, Sattva, Raja and Tama – these three are my enemies. These are considered to be of nine types according to their instincts. Joy, love and joy—these are the three sattvik qualities; Craving, anger and malice – these are the three Rajas gunas and tiredness, drowsiness and attachment – ​​these are the three Tamas gunas. 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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