श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 30: अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.30.5 
अलर्क उवाच
मनसो मे बलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जय:।
अन्यत्र बाणान् धास्यामि शत्रुभि: परिवारित:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अलर्क बोला, "मुझे मन से ही शक्ति मिली है, इसलिए मन ही सबसे अधिक शक्तिशाली है। मन पर विजय पाकर ही मैं स्थायी विजय प्राप्त कर सकता हूँ। मैं इन्द्रियरूपी शत्रुओं से घिरा हुआ हूँ, इसलिए बाह्य शत्रुओं पर आक्रमण करने के स्थान पर मैं इन आन्तरिक शत्रुओं को ही अपने बाणों का लक्ष्य बनाऊँगा।"
 
Alarka said, "I have got my strength from the mind, hence it is the most powerful. Only by conquering the mind can I achieve permanent victory. I am surrounded by enemies in the form of senses, therefore instead of attacking the external enemies, I will make these internal enemies the target of my arrows. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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