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श्लोक 14.30.33  |
इत्युक्त: स तपो घोरं जामदग्न्य: पितामहै:।
आस्थित: सुमहाभागो ययौ सिद्धिं च दुर्गमाम्॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| अपने पितामह की यह बात सुनकर परशुराम के पुत्र परम भाग्यशाली जमदग्नि ने घोर तपस्या की और ऐसा करके उन्होंने एक अत्यंत दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की। |
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| Upon hearing his grandfather say this, the very fortunate Jamadagni son of Parashurama performed severe penance and by doing so he attained an extremely rare accomplishment. |
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रिंशोऽध्याय:॥ ३०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०॥
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