श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 30: अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  14.30.32 
इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान् जहि।
तपो घोरमुपातिष्ठ तत: श्रेयोऽभिपत्स्यसे॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
(पितामह ने कहा -) बेटा परशुराम! इन सब बातों को अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियों का विनाश मत करो। घोर तप करो, उसी से तुम्हारा कल्याण होगा॥ 32॥
 
(The grandfather said -) Son Parashuram! After understanding all these things well, do not destroy the Kshatriyas. Engage in severe penance, only that will bring you welfare.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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