श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.3.2 
ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानव:।
करोति पुरुष: कर्म तत्र का परिदेवना॥ २॥
 
 
अनुवाद
यह मनुष्य या मनुष्य समुदाय भगवान की प्रेरणा से ही अच्छे या बुरे कर्म करता है, तो फिर इसके लिए शोक करने की क्या आवश्यकता है?॥2॥
 
This human being or community of men commits good or bad deeds under the inspiration of God. So what is the need to grieve for this?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)