|
| |
| |
श्लोक 14.29.19  |
राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि।
क्षत्रबन्धूनिमान् प्राणैर्विप्रयोज्य पुन: पुन:॥ १९॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| ‘पुत्र! परशुराम! यह वध-कर्म बंद करो। परशुराम! इन बेचारे क्षत्रियों के बार-बार प्राण लेने में तुम्हें क्या लाभ दिखाई देता है?’॥19॥ |
| |
| ‘Son! Parshuram! Stop this act of killing. Parshuram! What benefit do you see in taking the lives of these poor Kshatriyas again and again?’॥19॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|