श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 24: देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.24.4 
देवमत उवाच
केनायं सृज्यते जन्तु: कश्चान्य: पूर्वमेति तम्।
प्राणद्वन्द्वं च मे ब्रूहि तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
देवमत ने पूछा - नारदजी ! यह जीव किस कारण से उत्पन्न होता है ? कौन-सा दूसरा पदार्थ पहले कारण रूप में प्रकट होता है तथा ऊपर, मध्य और नीचे व्याप्त रहने वाला जीव का द्वैत क्या है ? 4॥
 
Devmat asked – Naradji! For what reason is this living being created? Which other substance first appears as a cause and what is the duality of life, which is prevalent above, in the middle and below? 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)