देवमत उवाच
केनायं सृज्यते जन्तु: कश्चान्य: पूर्वमेति तम्।
प्राणद्वन्द्वं च मे ब्रूहि तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत्॥ ४॥
अनुवाद
देवमत ने पूछा - नारदजी ! यह जीव किस कारण से उत्पन्न होता है ? कौन-सा दूसरा पदार्थ पहले कारण रूप में प्रकट होता है तथा ऊपर, मध्य और नीचे व्याप्त रहने वाला जीव का द्वैत क्या है ? 4॥
Devmat asked – Naradji! For what reason is this living being created? Which other substance first appears as a cause and what is the duality of life, which is prevalent above, in the middle and below? 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥