श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 24: देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  14.24.16 
ऊर्ध्वं समानो व्यानश्च व्यस्यते कर्म तेन तत्।
तृतीयं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
ऊर्ध्व अर्थात् ब्रह्म नामक संकल्प के कारण, जो सम और भेद हो जाता है, कर्म का विस्तार होता है। इसलिए संकल्प का निरोध कर देना चाहिए। जाग्रत और स्वप्न के अतिरिक्त जो तीसरी अवस्था है, उससे प्राप्त ब्रह्म का निर्धारण उसी के द्वारा होता है। 16॥
 
Due to the resolution called Urdhva i.e. Brahma, which becomes equal and different, karma expands. Therefore the resolution should be stopped. Apart from waking and dreaming, which is the third state, the Brahma obtained from it is determined only through the same. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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