श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 24: देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  14.24.12-13 
सत्त्वात् समानो व्यानश्च इति यज्ञविदो विदु:।
प्राणापानावाज्यभागौ तयोर्मध्ये हुताशन:॥ १२॥
एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदु:।
निर्द्वन्द्वमिति यत् त्वेतत् तन्मे निगदत: शृणु॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो लोग यज्ञ को जानते हैं, वे जानते हैं कि सत्वगुण से समान और व्यान उत्पन्न होते हैं। प्राण और अपान दो हवनों के समान हैं, जिन्हें आज्यभाग कहते हैं। इनके मध्य में अग्नि की स्थिति है। यह उदान का सर्वोत्तम रूप है, जो ब्राह्मणों को ज्ञात है। मैं तुम्हें वह भी बताता हूँ, जिसे निर्द्वन्द्व कहते हैं, उसे मेरे मुख से सुनो॥12-13॥
 
Those who know about Yajna know that from Sattva Guna, Samana and Vyana are born. Prana and Apana are like two oblations called Ajyabhag. In their middle is the position of fire. This is the best form of Udana, which is known to Brahmins. I will also tell you about that which is called Nirdvandva, listen to it from my mouth.॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)