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mahabharat 14.21.7: यह सम्पूर्ण जगत् जो जानने योग्य है, वह मन का ही स्वरूप है, यह ज्ञान अर्थात् प्रकाशक की अपेक्षा रखता है और वीर्य से उत्पन्न शरीर-समुदाय में रहने वाला देहधारी प्राणी ही इसे जानने वाला है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 14.21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.21.7 
सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानमवेक्षते।
रेत:शरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभृत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यह सम्पूर्ण जगत् जो जानने योग्य है, वह मन का ही स्वरूप है, यह ज्ञान अर्थात् प्रकाशक की अपेक्षा रखता है और वीर्य से उत्पन्न शरीर-समुदाय में रहने वाला देहधारी प्राणी ही इसे जानने वाला है ॥7॥
 
This entire world that comes to be known is only the form of the mind, it expects knowledge i.e. the Illuminator and the bodily being living in the body-community born from semen is the one who knows it. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)