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mahabharat 14.21.5: भाविनी! दस इन्द्रियाँ, दस देवता, दस हवि और समिधाएँ रूपी वस्तुएँ अग्नि में आहुति देती हैं (इस प्रकार मेरे अन्दर निरन्तर यज्ञ हो रहा है, फिर मैं आलसी कैसे हूँ?)॥5॥   |   mahabharat अध्याय 14.21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.21.5 
दशेन्द्रियाणि होतॄणि हवींषि दश भाविनि।
विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भाविनी! दस इन्द्रियाँ, दस देवता, दस हवि और समिधाएँ रूपी वस्तुएँ अग्नि में आहुति देती हैं (इस प्रकार मेरे अन्दर निरन्तर यज्ञ हो रहा है, फिर मैं आलसी कैसे हूँ?)॥5॥
 
Bhavini! Ten in the form of senses, ten in the form of gods, ten objects in the form of oblations and samidhas are offered in the fire (Thus, Yagya is continuously being performed within me; then how am I indolent?)॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)