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mahabharat 14.21.20: तभी प्राणशक्ति पुनः प्रकट हुई और वाणी को बल मिला। इसीलिए वाणी साँस लेते समय कभी कोई शब्द नहीं बोलती।   |   mahabharat अध्याय 14.21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  14.21.20 
तत: प्राण: प्रादुरभूद् वाचमाप्याययन् पुन:।
तस्मादुच्छ्वासमासाद्य न वाग् वदति कर्हिचित्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
तभी प्राणशक्ति पुनः प्रकट हुई और वाणी को बल मिला। इसीलिए वाणी साँस लेते समय कभी कोई शब्द नहीं बोलती।
 
Then the life force appeared once again, strengthening the voice. That is why the voice never utters any words while breathing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)