श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  14.20.15-16 
समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतु:॥ १५॥
तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च।
अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति।
तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ न मुञ्चत:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
प्राण और अपान, समान और व्यान के बीच विचरण करते हैं। जब प्राण और अपान विलीन हो जाते हैं, तो समान और व्यान भी विलीन हो जाते हैं। उदान, अपान और प्राण के बीच स्थित है, सबमें व्याप्त है। इसीलिए प्राण और अपान सोए हुए व्यक्ति को नहीं छोड़ते।॥ 15-16॥
 
‘Prana and Apana move between Samana and Vyana. When Prana along with Apana dissolves, Samana and Vyana also dissolve. Udana is situated between Apana and Prana, pervading everything. That is why Prana and Apana do not leave the sleeping person.॥ 15-16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas