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mahabharat 14.20.14-15h: सम्पूर्ण जगत् उसी से फैला हुआ है और उसी में स्थित है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - ये उसी से निकलते हैं और फिर उसी में प्रविष्ट होते हैं।॥14 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 14.20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  14.20.14-15h 
यत: प्रवर्तते तन्त्रं यत्र च प्रतितिष्ठति।
प्राणोऽपान: समानश्च व्यानश्चोदान एव च॥ १४॥
तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च।
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण जगत् उसी से फैला हुआ है और उसी में स्थित है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान - ये उसी से निकलते हैं और फिर उसी में प्रविष्ट होते हैं।॥14 1/2॥
 
‘The entire universe is spread out from Him and exists in Him. Prana, Apana, Samana, Vyana and Udana – these emerge from Him and then enter Him.॥ 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)