| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 14.20.13  | चक्षुषामविषह्यं च यत् किंचिच्छ्रवणात् परम्।
अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम्॥ १३॥ | | | | | | अनुवाद | | वह नेत्रों का विषय नहीं हो सकता। वह अवर्णनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रिय से सर्वथा परे है। उसमें गंध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी गुण नहीं हैं॥13॥ | | | | ‘He cannot be the object of the eyes. That indescribable Supreme Brahman is completely beyond the reach of the sense of hearing. No characteristics like smell, taste, touch, form and sound are available in Him.॥ 13॥ | | ✨ ai-generated | | |
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