Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.19.8-9: जो किसी भी कर्म का कर्ता नहीं बनता, जिसके मन में कोई कामना नहीं रहती, जो इस संसार को अश्वत्थ वृक्ष के समान अनित्य मानता है, जो कल तक नहीं टिक सकता तथा जो इसे जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के अधीन जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्य में लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषों पर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बंधन को नष्ट कर देता है ॥8-9॥ | mahabharat अध्याय 14.19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जो किसी भी कर्म का कर्ता नहीं बनता, जिसके मन में कोई कामना नहीं रहती, जो इस संसार को अश्वत्थ वृक्ष के समान अनित्य मानता है, जो कल तक नहीं टिक सकता तथा जो इसे जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के अधीन जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्य में लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषों पर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बंधन को नष्ट कर देता है ॥8-9॥
He who does not become the doer of any action, who has no desire in his mind, who considers this world to be as temporary as the Ashwattha tree, which cannot last till tomorrow, and who always knows that it is subject to birth, death and old age, whose intellect is engaged in detachment and who constantly keeps an eye on his faults, he soon destroys his bondage. ॥ 8-9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥