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mahabharat 14.19.7: जो न तो धर्म में आसक्ति रखता है और न अधर्म में, जिसने पूर्व संचित कर्मों का त्याग कर दिया है, जिसका मन इच्छाओं के नष्ट हो जाने से शांत हो गया है और जो सब प्रकार के द्वन्द्वों से रहित है, वह मुक्त हो जाता है॥7॥   |   mahabharat अध्याय 14.19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.19.7 
नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायक:।
धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्व: स विमुच्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो न तो धर्म में आसक्ति रखता है और न अधर्म में, जिसने पूर्व संचित कर्मों का त्याग कर दिया है, जिसका मन इच्छाओं के नष्ट हो जाने से शांत हो गया है और जो सब प्रकार के द्वन्द्वों से रहित है, वह मुक्त हो जाता है॥7॥
 
He who has neither attachment to religion nor to unrighteousness, who has given up the previously accumulated deeds, whose mind has become calm due to the extinction of desires and who is free from all kinds of conflicts, becomes free. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)