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श्लोक 14.19.66  |
एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयोऽस्ति किंचन।
षण्मासान् नित्ययुक्तस्य योग: पार्थ प्रवर्तते॥ ६६॥ |
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| अनुवाद |
| पार्थ! बस इतना ही कहा जा सकता है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। जो व्यक्ति छह महीने तक निरंतर योग का अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध होता है। 66। |
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| Partha! This is all that can be said. There is nothing greater than this. One who practices yoga continuously for six months, his yoga is definitely accomplished. 66. |
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९॥
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