श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  14.19.56 
नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रोणेति मे मति:।
नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती नन्दन! मेरा मानना ​​है कि जिसका मन चंचल है और जिसने ज्ञान की शिक्षा प्राप्त नहीं की है, वह इस विषय को सरलता से नहीं समझ सकता। केवल वही व्यक्ति इसे समझ सकता है जिसका हृदय शुद्ध है। ॥ 56॥
 
Kunti Nandan! I believe that a person whose mind is restless and who has not received the teachings of knowledge cannot understand this subject easily. Only a person whose heart is pure can understand it. ॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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